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Tuesday, January 19, 2016



in news prikaram
मेरठ, बागपत, रूडकी व सहारनपुर में हुए तब्लीगी इज्तमों में पहुंची लाखों की अपार भीड को देखकर पता चलता है कि इस्लाम धर्म कितना अनुशासित, एकता अखंडता व ऊंच नीच के भेदभाव को खत्म करने का पक्षधर है क्योंकि अल्लाह की वहदानियत के नाम पर पहुंची लाखों की भीड में क्या अमीर, क्या गरीब सबके सब एक ही सफ में बैठे नजर आये। बिना प्रशासन की मदद के भीड को संभालना मुश्किल होता है, लेकिन इन इज्तमों में बिना प्रशासन की मदद के बडे ही अनुशासित तरीके से तीन दिवसीय इज्तमों का आयोजन किया जाता है।
तब्लीगी जमात एक ऐसी जमात जो अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाने तथा अल्लाह व उसके रसूल (स.अ.व.) की बताई शिक्षाओें पर अमल कराने के लिए वजूद में आई थी। आज भी अपने कर्तव्यों का निर्वाहन उसी शिद्दत से कर रही है जिस मकसद के साथ इस जमात का गठन किया गया था। बताते चले कि हिन्दुस्तान में एक ऐसा दौर भी आया जब मुसलमान अपनी दीनी तालीमात से बेजार हो गये थे। जो सिर्फ नाम के मुसलमान रह गये थे। इसी दौर में मौलाना मौ. इलियास (रह.) ने मुसलमानों के इन हालात को देखकर उन तक अल्लाह की वहदानियत व हजरत मुहम्मद (स.अ.व.) की तालीमात को पहुंचाने के लिए हरियाणा के जिला गुडगांव मेवात से दावत ए तब्लीग का बीडा उठाया। मेवात में सन 1934 में मौलाना मौ. इलियास (रह.) की अध्यक्षता में एक पंचायत का आयोजन किया गया। जिसमें मेवात के 107 लोगों ने भाग लिया और यह बात तय की गयी कि सामुहिक रूप से दावत ए तब्लीग का काम मुसलमानों के हर तबके में मिलजुलकर शुरू किया जाये। जिसके बाद चन्द दिनों में ही पूरे मेवात व आसपास के क्षेत्रों में बडी तेजी के साथ दावत ए तब्लीग का कार्य फैलने लगा। जिस पर मौलाना मौ. इलियास (रह.) ने इस दावत ए तब्लीग के काम के लिए हर सप्ताह कुछ समय निकालकर एक जमाअत बनाने का निर्णय लिया जिसको आसपास के क्षेत्र व दूर दराज की मुस्लिम बस्तियों में भेजकर कलमा तौहीद की इस्लाह और नमाज आदि की तलकीन की जाये। इस अमल का नाम गश्त रखा गया। हर महीने तीन दिन के लिए पांच किमी के अन्दर जमाअत की सूरत में जाकर दावत ए तब्लीग का काम करने का निर्णय लिया गया। हजरत मौलाना मौ. इलियास रह. की ख्वाहिश के मुताबिक देश विदेश तक लोगों से परिचित कराया गया। सबसे पहले मौलाना इलियास रह. ने सऊदी अरब का सफर कर वहां पर इस दावती काम की बुनियाद डाली। सबसे पहला इज्तमा 1942 में मेवात के कस्बा नूह में आयोजित किया गया। जिसमें तकरीबन 25 हजार लोगों ने भाग लिया। इसके दो साल बाद व्यापारियों की एक जमाअत को लखनऊ के लिए रवाना किया गया। 1944 को जमाअत के संस्थापक मौलाना इलियास रह. के निधन के बाद उनके पुत्र मौलाना युसुफ को जमाअत का अमीर बनाया गया। उनके दौर में तब्लीग का काम बहुत तेजी से आगे बढा और देश व विदेश से बहुत सी जमाअते आने लगी। यहां तक कि अरेबियन देशो के साथ-साथ यूरोप, अमेरिका, जापान, ब्रिटेन और अन्य देशों से जमाअते दिल्ली मरकज से आनी जानी शुरू हो गयी। भोपाल का सालाना आलमी जलसा 1948 में शुरू हुआ। मौलाना मौ. युसुफ रह. के निधन के बाद मौलाना इनामुल हसन को अमीर जमाअत बनाया गया। जिनके दौर में इस दावत तब्लीग के काम ने दिन दुगनी रात चैगनी तरक्की की और बडे-बडे तब्लीगी इज्तमा होने लगे। आज भी तब्लीगी जमाअत शिर्क, बिदअत, रसूमात, खुराफात, जहालत, गुमराही, बददीनी, कादयानियत आदि हजार तरह के फितनों का खामोशी के साथ मुकाबला कर रही है और तमाम फरजन्दान ए तौहीद को तौहीद पर रखकर बखूबी बचानेे के काम में लगी हुई है। अब इस तब्लीगी जमात की कमान मौलाना इलियास रह. के प्रपौत्र मौलाना साद व कमेटी के हाथों में है जो इस कार खैर को बखूबी अंजाम दे रहे है।
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